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कहाँ हैं तथाकथित बाल अधिकारों के संग्रक्षक?



National School of Journalism (NSoJ) Bureau, Bangalore: सोचने वाली बात है कि पूरे विश्व भर में न जाने कितने ऐसे संगठन हैं जो बाल विकास और शिक्षा को बल देने के लिए कर्तव्यनिष्ठ हैं । कहीं भी देख लिजिए राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दोनों ही पटलों पर ये तो साफ ही नज़र आता है कि विश्व आज तत्पर है संसार से उन सभी समस्याओं को जड़ से ख‌तम कर देने के लिए । आज अगर गिनती करने बैठ जाऐं तो विश्वभर में लखों ऐसी सरकारी, गैर सरकारी सिस्थाऐं होंगी जो आज इस दिशा में काम कर रहीं हैं और बलकों से सम्बंधित समस्स्याओं का समाधान ढ़ूँढ़ रहीं हैं, और अगर बात सिर्फ भारत की कीजाए तो शायद इस संख्या का एक बहुत बड़े हिस्से का मलिक वो ही होगा । अब जब आप इतना सब सोच रहे होते हैं तो यकीनन ही आपका ध्यान इस बात पर भी अवश्य ही जएगा की ये तो 100 टका सच है कि हाँ संस्थाऐं तो अनेक हैं फिर आज़ादी के लग्भग 100 सालों बाद भी देश में बाल-उत्पीड़न, बाल-श्रम, अशिक्षा जैसे अभिशापों की तस्वीर जस की तस ही है , कैसे..?

यूनीसफे, यूनेस्को, डब्लू.एच.ओ, जैसी अंतर राष्ट्रीय और कई राष्ट्रीय संस्थाओं का हाथ होने के बावजूद आज भी इन किस्सों का हाल ये मुहावरा बखूबी दर्शाता है कि “नौ दिन चले… अढ़ाई कोस..!” यानी परिस्तिथियाँ वही बरकरार हैं। ऐसा भी नहीं है कि कुछ किया नहीं जा रहा यूँतो बहुत कुछ प्रयास किए जा रहे हैं मगर सवाल ये है कि परिणाम क्यों नज़र नहीं आ रहे । क्या यहाँ भी किसी प्रकार के स्वार्थ के चलते वो सभी नीतियाँ जो बाल हितों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई हैं सही तरह से क्रियानवित नहीं किया जा रहीं ? क्योंकि और कोई तो वजह नहीं हो सकती की आज भी इतने प्रकार के प्रयास किए जने के बाद भी कोई बदलाव प्र्स्त्यक्ष नहीं है।


आज भी हालात ये हैं कि देश के कई गाँव ऐसे हैं जहाँ बच्चों ने स्कूल का चेहेरा तक नहीं देखा । अशिक्षित होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं मिल पाती और इस डर के करण जनम लेती है बाल श्रम की भयावा समस्या जो अक्सर ही बच्पन को जानलेवा रसायनों के बीच झुलसने के लिए मज्बूर कर देती है और वहाँ से उपजती है बल-उत्पीड़्न का खौफनाक सच । पूरी एक कड़ी है हालातों की, जिसकी जनक है अशिक्षा और जिसके लिए ये सारी उपर्युक्त सस्थाऐं सदा तत्पर हैं काम भी कर रहीं हैं मगर परिणाम अदृष्य हैं ।

दो तरह के पैमानें होते हैं किसी भी परिस्तिथी को जाँचने के लिए पहेला सैधांतिक दूसरा वास्तविक इस परिस्तिथी में दोनों ही एक दूसरे के विपरीत हैं | हाल ही में हुए सर्वेक्षणों के निष्कर्श के अनुसार वो प्रभावी कारण जो परिणामों के सदृश्य होने में बाधा का काम कर रहे हैं वो खुद वो ही संस्थाऐं हैं जिनके पास इस परिस्तिथी काबू करने का ज़िम्मा है । ये आपस में ही ताल-मेल नहीं बिठा पा रहे हैं सबके पास अपनी अपनी दलीलें हैं अपना अपना तरीका है और कोई भी उस्के आगे सामने वाले की सुनना नहीं चाहता और हालातों को अपने तरीके से समझना और सुलझाना चाहता है । फिर चाहें पुलिस हो , कोई एन.जी.ओ हो , काउनसिलर हों या कोई और सरकारी संस्थान हो सब ही अपने अपने स्वार्थ पूर्ती में लगे हुए हैं जैसे कि कोई इस बात से इत्तफाक ही नहीं रखता की आखिर कोई सिर्फ उनकी दिखाई लकीरों पर चलकर अपना जीवन सवारना चाह्ता है । और इस प्रकार के रवैये के साथ वो कैसे इस समस्या का समाधान निकाल पाऐंगे और अंत्तः परिणाम तो ये होने ही हैं । क्यूँकी यहाँ कोई भी दूसरे को तवज्जो नहीं देता और अपने तरीके से ही परिस्तिथी को हल करना चाहता ताकी उसकी पीठ थपथपाई जाए । हास्य्यद्पद दिखाई देते ये हालात मात्र मिथ्या नहीं सच्चाई है जो ज़िम्मेदार है असीम किशिशों के बाद भी नाकाम नतीजों की ।

हालाकि ऐसा भी नहीं है कि हालात बिल्कुल निराशा जनक हैं मगर अब भी सफर काफी लम्बा है और जो भी हासिल किया है वो फिल्हाल नाकाफी है ।

हर दूसरे दिन एक नई कहाँनी सुनने में आती है किसी बच्चे के असहाय होने की और आँकड़े भी देख लिजिए टाइम्स अ‍ॅफ इंडिया में छपी एक रेपोर्त के मुताबिक सन, 2012-2013 में बक्चों के खिलाफ अपराध का दर 24% से बढ़कर 54.4% हो गया है जो अपने आप मैं ही एक विचारणीय स्तथी है । एन.सी.बी.आर की 2012-13 की रिपोर्ट के अनुसार बंगलूरू 551 मामलों के साथ देश का सबसे असुरक्षित शहर है , मुम्बई 540 मामलों के साथ दूसरी और दिल्ली 363 माम्लों के साथ तीसरी सबसे अशुरक्षित शहर हैं जहाँ बच्चों के खिलाफ अपराध चरम पर हैं । इन अपराधों की वजह है बचपन को नज़र अंदाज़ करना उन्हें-अनकी बातों को आड़े हाथ ना लेना। बाल स6रक्षण अधिकारी श्री विश्व विमोहन कुलश्रेष्ठ ((फिरोज़ाबाद, यू.पी.) का कहना है कि “बच्चे में सहस और आत्मविश्वास का होना आज के समय में अति आवश्यक है और साथ ही परिवार को भी इस बात का पुरा खयाल रखना चाहिए कि बच्चे को उन्हें किसी भी तरह की बात बतने में हिचकिचाहट ना हो..घर का महौल ऐसा हो जो उन्हें खुल के अभिव्यक्ती की अज़दी दे ।“ और शायद ये एक अच्छा वैकल्पिक रास्ता हो सक्ता है जो देश में हालतों को बदल सकें ।